अध्याय 18, श्लोक 56 (भगवद् गीता 18.56)
संस्कृत श्लोक
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्
लिप्यंतरण
sarva-karmāṇy api sadā kurvāṇo mad-vyapāśhrayaḥ mat-prasādād avāpnoti śhāśhvataṁ padam avyayam
शब्दार्थ
sarva—all; karmāṇi—actions; api—though; sadā—always; kurvāṇaḥ—performing; mat-vyapāśhrayaḥ—take full refuge in me; mat-prasādāt—by my grace; avāpnoti—attain; śhāśhvatam—the eternal; padam—abode; avyayam—imperishable
अनुवाद
सर्वदा सब कर्मों को करता हुआ भी जो मेरे परायण होकर मेरे शरण में रहता है, वह मेरे प्रसाद से शाश्वत और अविनाशी पद को प्राप्त कर लेता है।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से जीव को कर्मयोग का सर्वोच्च रहस्य प्रदान कर रहे हैं। जब साधक समस्त कर्मों का भार स्वयं लेने के बजाय उन्हें पूर्णतः श्री कृष्ण को समर्पित कर देता है, तो वह बंधन से मुक्त हो जाता है। यह समर्पण केवल क्रिया नहीं, बल्कि हृदय की एक अवस्था है जहाँ भक्त अपने अस्तित्व को भगवान के आश्रय में विलीन कर देता है। श्री कृष्ण का अनुग्रह ही वह दिव्य शक्ति है जो आत्मा को जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठाकर उनके शाश्वत धाम तक पहुँचाती है। भगवद कृपा के बिना मोक्ष दुर्लभ है, और जो भक्त अनन्य भाव से श्री कृष्ण की शरण लेता है, उसके लिए वह अविनाशी पद सुलभ हो जाता है।