अध्याय 18, श्लोक 62 (भगवद् गीता 18.62)

अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग

संस्कृत श्लोक

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्

लिप्यंतरण

tam eva śharaṇaṁ gachchha sarva-bhāvena bhārata tat-prasādāt parāṁ śhāntiṁ sthānaṁ prāpsyasi śhāśhvatam

शब्दार्थ

tam—unto him; eva—only; śharaṇam gachchha—surrender; sarva-bhāvena—whole-heartedly; bhārata—Arjun, the son of Bharat; tat-prasādāt—by his grace; parām—supreme; śhāntim—peace; sthānam—the abode; prāpsyasi—you will attain; śhāśhvatam—eternal

अनुवाद

हे अर्जुन! तुम सर्वभाव से उसी भगवान श्री कृष्ण की शरण में जाओ। उनकी कृपा से ही तुम परम शान्ति और सनातन धाम को प्राप्त करोगे।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण समस्त मानवता को पूर्ण शरणागति का मार्ग दिखा रहे हैं। वे अर्जुन के माध्यम से हमें यह समझा रहे हैं कि जब साधक अपने अहंकार को त्यागकर पूर्ण समर्पण के साथ भगवान श्री कृष्ण की शरण लेता है, तब ईश्वरीय कृपा का अवतरण होता है। यह कृपा ही जीव के समस्त कर्म-बंधनों को काटकर उसे परम शान्ति की अनुभूति कराती है। भगवान श्री कृष्ण का शाश्वत धाम ही अंतिम लक्ष्य है, जहाँ पहुँचकर जीव जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। अतः, भगवान श्री कृष्ण पर अडिग विश्वास और प्रेमपूर्ण शरणागति ही मोक्ष का एकमात्र और सरलतम मार्ग है।

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