अध्याय 18, श्लोक 74 (भगवद् गीता 18.74)
संस्कृत श्लोक
सञ्जय उवाचइत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्
लिप्यंतरण
sañjaya uvācha ity ahaṁ vāsudevasya pārthasya cha mahātmanaḥ saṁvādam imam aśhrauṣham adbhutaṁ roma-harṣhaṇam
शब्दार्थ
sañjayaḥ uvācha—Sanjay said; iti—thus; aham—I; vāsudevasya—of Shree Krishna; pārthasya—Arjun; cha—and; mahā-ātmanaḥ—the noble hearted soul; saṁvādam—conversation; imam—this; aśhrauṣham—have heard; adbhutam—wonderful; roma-harṣhaṇam—which causes the hair to stand on end
अनुवाद
संजय ने कहा: इस प्रकार मैंने भगवान् श्रीकृष्ण और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत और रोमांच उत्पन्न करने वाले संवाद को सुना है।
अर्थ एवं व्याख्या
यह संवाद मात्र शब्दों का संग्रह नहीं, अपितु स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा प्रदान किया गया दिव्य प्रकाश है जो आत्मा के अज्ञान को मिटा देता है। जब साधक श्रद्धा और समर्पण के साथ भगवान् श्रीकृष्ण की वाणी का श्रवण करता है, तो उसका हृदय भक्ति के आनंद से पुलकित हो उठता है। यह संवाद मानवता को यह स्मरण कराता है कि जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य केवल सांसारिक कर्तव्य नहीं, बल्कि उस परम सत्य को जानना है जो साक्षात भगवान् के मुख से प्रकट हुआ है। अर्जुन का माध्यम बनकर श्रीकृष्ण ने प्रत्येक जीव को शरणागति और निष्काम कर्म का शाश्वत मार्ग दिखाया है। जो कोई भी इस दिव्य संवाद को आत्मसात करता है, वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।