अध्याय 2, श्लोक 36 (भगवद् गीता 2.36)

अध्याय 2: सांख्ययोग

संस्कृत श्लोक

अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः। निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्

लिप्यंतरण

avāchya-vādānśh cha bahūn vadiṣhyanti tavāhitāḥ nindantastava sāmarthyaṁ tato duḥkhataraṁ nu kim

शब्दार्थ

avāchya-vādān—using harsh words; cha—and; bahūn—many; vadiṣhyanti—will say; tava—your; ahitāḥ—enemies; nindantaḥ—defame; tava—your; sāmarthyam—might; tataḥ—than that; duḥkha-taram—more painful; nu—indeed; kim—what

अनुवाद

तुम्हारे शत्रु तुम्हारे सामर्थ्य की निन्दा करते हुए बहुत से अकथनीय वचन कहेंगे, इससे अधिक कष्टदायक और क्या हो सकता है?

अर्थ एवं व्याख्या

यह श्लोक मनुष्य के उस अहंकार पर प्रहार करता है जो अपनी प्रतिष्ठा को जीवन से भी अधिक मूल्यवान मानता है। श्री कृष्ण यह समझा रहे हैं कि अपमान का भय मृत्यु के भय से भी अधिक पीड़ादायक होता है क्योंकि यह हमारे 'अहं' को चुनौती देता है। आध्यात्मिक स्तर पर, यह शिक्षा हमें सिखाती है कि जब तक हम दूसरों की राय से प्रभावित होते रहेंगे, तब तक मन में अशांति बनी रहेगी। गीता हमें आत्म-साक्षात्कार की ओर प्रेरित करती है जहाँ व्यक्ति लोक-निन्दा से ऊपर उठकर अपनी अंतरात्मा में स्थित हो जाता है। वास्तव में, सुख और दुःख के द्वंद्वों से मुक्ति तभी संभव है जब हम बाहरी मूल्यांकन के मोह को त्याग दें।

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