अध्याय 2, श्लोक 38 (भगवद् गीता 2.38)
संस्कृत श्लोक
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि
लिप्यंतरण
sukha-duḥkhe same kṛitvā lābhālābhau jayājayau tato yuddhāya yujyasva naivaṁ pāpam avāpsyasi
शब्दार्थ
sukha—happiness; duḥkhe—in distress; same kṛitvā—treating alike; lābha-alābhau—gain and loss; jaya-ajayau—victory and defeat; tataḥ—thereafter; yuddhāya—for fighting; yujyasva—engage; na—never; evam—thus; pāpam—sin; avāpsyasi—shall incur
अनुवाद
सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर, तत्पश्चात युद्ध के लिए तैयार हो जाओ; इस प्रकार युद्ध करने से तुम पाप को प्राप्त नहीं होगे।
अर्थ एवं व्याख्या
यह श्लोक निष्काम कर्म योग का आधार प्रस्तुत करता है, जहाँ कर्ता का ध्यान फल से हटकर कर्तव्य पर केंद्रित होता है। जीवन की द्वैतताएँ—जैसे सुख-दुःख या हार-जीत—मन को विचलित करती हैं, लेकिन समभाव की स्थिति में व्यक्ति इन बंधनों से मुक्त हो जाता है। जब हम अपने कार्य को अहंकार रहित होकर केवल कर्तव्य समझकर करते हैं, तो वह कर्म बंधन का नहीं, बल्कि मुक्ति का साधन बन जाता है। यह शिक्षा हमें सिखाती है कि शांति बाहरी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि मन की उस स्थिरता में है जो परिणाम की चिंता से मुक्त है।