अध्याय 2, श्लोक 40 (भगवद् गीता 2.40)
संस्कृत श्लोक
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्
लिप्यंतरण
nehābhikrama-nāśho ’sti pratyavāyo na vidyate svalpam apyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt
शब्दार्थ
na—not; iha—in this; abhikrama—efforts; nāśhaḥ—loss; asti—there is; pratyavāyaḥ—adverse result; na—not; vidyate—is; su-alpam—a little; api—even; asya—of this; dharmasya—occupation; trāyate—saves; mahataḥ—from great; bhayāt—danger
अनुवाद
इस मार्ग में आरम्भ किए हुए कार्य का नाश नहीं होता और उसका उल्टा फल भी नहीं होता, बल्कि इस धर्म का थोड़ा सा भी अभ्यास जन्म-मरण रूप महान भय से रक्षा कर लेता है।
अर्थ एवं व्याख्या
यह श्लोक आध्यात्मिक साधक को यह आश्वस्त करता है कि योग के मार्ग में की गई कोई भी मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती। भौतिक जगत के कार्यों के विपरीत, यहाँ अधूरा प्रयास भी व्यर्थ नहीं होता, बल्कि वह साधक की चेतना में संस्कार बनकर अंकित हो जाता है। यह शिक्षा हमें असफलता के भय से मुक्त करती है और सिखाती है कि हमारी आत्मिक उन्नति निरंतर है। जब हम निस्वार्थ भाव से थोड़ा सा भी अभ्यास करते हैं, तो वह हमारी रक्षा के लिए एक कवच का कार्य करता है और हमें मृत्यु तथा संसार के महान भय से उबार लेता है।