अध्याय 2, श्लोक 52 (भगवद् गीता 2.52)

अध्याय 2: सांख्ययोग

संस्कृत श्लोक

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च

लिप्यंतरण

yadā te moha-kalilaṁ buddhir vyatitariṣhyati tadā gantāsi nirvedaṁ śhrotavyasya śhrutasya cha

शब्दार्थ

yadā—when; te—your; moha—delusion; kalilam—quagmire; buddhiḥ—intellect; vyatitariṣhyati—crosses; tadā—then; gantāsi—you shall acquire; nirvedam—indifferent; śhrotavyasya—to what is yet to be heard; śhrutasya—to what has been heard; cha—and

अनुवाद

जब तेरी बुद्धि मोह-रूपी दलदल को भली-भांति पार कर जाएगी, तब तू सुने हुए और सुनने योग्य सभी भोगों से विरक्त हो जाएगा।

अर्थ एवं व्याख्या

यह श्लोक प्रज्ञा की उस उच्च अवस्था का वर्णन करता है जहाँ साधक का मन बाहरी संसार के प्रलोभनों और शास्त्रों के औपचारिक ज्ञान से ऊपर उठ जाता है। मोह का दलदल वही है जो हमें अतीत की स्मृतियों और भविष्य की चिंताओं में उलझाए रखता है। जब विवेक जागृत होता है, तब हम कर्मों के फल की इच्छा से मुक्त होकर सहज स्थितप्रज्ञ बन जाते हैं। यह आंतरिक रूपांतरण व्यक्ति को द्वैत से परे ले जाता है, जहाँ उसे और कुछ भी पाने की आकांक्षा शेष नहीं रहती।

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