अध्याय 3, श्लोक 34 (भगवद् गीता 3.34)

अध्याय 3: कर्मयोग

संस्कृत श्लोक

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ। तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ

लिप्यंतरण

indriyasyendriyasyārthe rāga-dveṣhau vyavasthitau tayor na vaśham āgachchhet tau hyasya paripanthinau

शब्दार्थ

indriyasya—of the senses; indriyasya arthe—in the sense objects; rāga—attachment; dveṣhau—aversion; vyavasthitau—situated; tayoḥ—of them; na—never; vaśham—be controlled; āgachchhet—should become; tau—those; hi—certainly; asya—for him; paripanthinau—foes

अनुवाद

इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में राग और द्वेष छिपे हुए हैं; मनुष्य को इनके वश में नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये दोनों ही उसके मार्ग के शत्रु हैं।

अर्थ एवं व्याख्या

यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमारे सुख-दुःख का मुख्य कारण बाह्य वस्तुएं नहीं, बल्कि उनके प्रति हमारे मन की प्रतिक्रियाएं हैं। जब हम राग और द्वेष के अधीन हो जाते हैं, तो हमारा विवेक नष्ट हो जाता है और हम अपनी स्वाभाविक शांति खो बैठते हैं। इन भावों को 'शत्रु' इसलिए कहा गया है क्योंकि ये हमें सत्य को देखने से रोकते हैं और हमें विकारों के चक्र में फंसाए रखते हैं। इनसे मुक्त होने का अर्थ भावनाओं का दमन करना नहीं, बल्कि उन्हें तटस्थ भाव से देखना है। सचेत जागरूकता के माध्यम से ही मनुष्य अपने मन के इन गुप्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सकता है।

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