अध्याय 4, श्लोक 13 (भगवद् गीता 4.13)

अध्याय 4: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

संस्कृत श्लोक

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्

लिप्यंतरण

chātur-varṇyaṁ mayā sṛiṣhṭaṁ guṇa-karma-vibhāgaśhaḥ tasya kartāram api māṁ viddhyakartāram avyayam

शब्दार्थ

chātuḥ-varṇyam—the four categories of occupations; mayā—by me; sṛiṣhṭam—were created; guṇa—of quality; karma—and activities; vibhāgaśhaḥ—according to divisions; tasya—of that; kartāram—the creator; api—although; mām—me; viddhi—know; akartāram—non-doer; avyayam—unchangeable

अनुवाद

गुण और कर्मों के विभागानुसार मेरे द्वारा चार वर्णों की रचना की गई है। यद्यपि मैं इसका रचयिता हूँ, तथापि मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।

अर्थ एवं व्याख्या

यह श्लोक स्पष्ट करता है कि समाज का विभाजन जन्म पर नहीं, बल्कि व्यक्ति के स्वभाव और उसके कार्यों की दक्षता पर आधारित है। भगवान यह सिखाते हैं कि संसार के रचयिता होने के बावजूद वे कर्मों के फलों और द्वंद्वों से सदा निर्लिप्त रहते हैं। हमें भी जीवन में अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा से करना चाहिए, किंतु अहंकार से मुक्त होकर यह समझना चाहिए कि हम वास्तव में शुद्ध आत्मा हैं। जब हम स्वयं को कर्मों का भोक्ता न मानकर केवल एक साक्षी के रूप में देखते हैं, तो हम सांसारिक दुखों से ऊपर उठ जाते हैं। यह दर्शन हमें सिखाता है कि कर्तव्य कर्म ही धर्म है, लेकिन कर्म का बंधन हमें तभी प्रभावित करता है जब हम उसमें स्वयं को 'कर्ता' मान लेते हैं।

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