अध्याय 4: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (Jñāna Karm Sanyās Yog) · 42 श्लोक
अध्याय सारांश
भगवद गीता का चौथा अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग योग है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण कर्मयोग का गुणगान करते हैं अथवा अर्जुन को आत्मा एवं परम सत्य का बोध कराते हैं। वे भौतिक संसार में अपनी उपस्तिथि के पीछे कारण का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि भले ही वह अनन्त हैं, फिर भी वह इस धरती पर धर्म और शांति को पुन: स्थापित करने के लिए समय समय पर जन्म लेते रहते हैं। उनके जन्म और क्रियाकलाप शाश्वत हैं और सामूहिक दोषों से कभी भी दूषित नहीं होते हैं। वे मनुष्य जो इस सत्य को जानते और समझते हैं, वे संपूर्ण श्रद्धा के साथ उनकी भक्ति करते हैं और अंततः उन्हें प्राप्त करते हैं। उनहे इस दुनिया में फिर से जन्म लेने की जरूरत नहीं है।
श्लोक
- 4.1 — श्रीभगवान् बोले: मैंने इस अविनाशी योग का उपदेश विवस्वान् (सूर्य) को दिया था, विवस्वान् ने मनु से कहा और मनु…
- 4.2 — इस प्रकार परम्परा से प्राप्त हुए इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु हे परन्तप! समय के अंतराल के कारण वह…
- 4.3 — वही यह पुरातन योग आज मैंने तुम्हें कहा है, क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो; यह बहुत ही उत्तम रहस्य है।
- 4.4 — अर्जुन ने कहा, 'आपका जन्म तो बाद का है और विवस्वान का जन्म पहले हुआ था, फिर मैं कैसे समझूँ कि आपने ही सृष्टि…
- 4.5 — श्रीभगवान बोले: हे अर्जुन! मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म बीत चुके हैं। मैं उन सबको जानता हूँ, परन्तु हे…
- 4.6 — यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ और सभी प्राणियों का ईश्वर हूँ, तथापि अपनी प्रकृति को वश में करके अपनी माया…
- 4.7 — यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
- 4.8 — साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना…
- 4.9 — हे अर्जुन! जो कोई मेरे जन्म और कर्मों को दिव्य रूप में जान लेता है, वह शरीर त्यागने के बाद फिर जन्म नहीं…
- 4.10 — वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥
- 4.11 — जो मनुष्य मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं उनको उसी प्रकार भजता हूँ; क्योंकि हे पार्थ! सब मनुष्य सब प्रकार से…
- 4.12 — इस मनुष्यलोक में कर्मों के फल की कामना रखने वाले लोग देवताओं का पूजन करते हैं, क्योंकि यहाँ कर्मों से मिलने…
- 4.13 — गुण और कर्मों के विभागानुसार मेरे द्वारा चार वर्णों की रचना की गई है। यद्यपि मैं इसका रचयिता हूँ, तथापि मुझे…
- 4.14 — कर्म मुझे लिप्त नहीं करते और न ही मुझे कर्मों के फल की कोई आकांक्षा है। जो मुझे इस प्रकार तत्व से जान लेता…
- 4.15 — पूर्वकाल के मुमुक्षु पुरुषों ने भी ऐसा जानकर ही कर्म किया है, अतः तुम भी पूर्वजों द्वारा सदा से किए जाने…
- 4.16 — कर्म क्या है और अकर्म क्या है? इस विषय में बुद्धिमान पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुम्हें वह कर्म…
- 4.17 — कर्म का स्वरूप जानना चाहिए, विकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए और अकर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए; क्योंकि कर्म…
- 4.18 — जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है; वह योगी है और सभी कर्मों को करने…
- 4.19 — जिसके समस्त कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं, तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्नि के द्वारा भस्म हो गए हैं,…
- 4.20 — जो पुरुष कर्मफलों की आसक्ति को त्यागकर सदैव तृप्त रहता है और किसी पर निर्भर नहीं है, वह कर्मों में पूरी तरह…
- 4.21 — जिसकी आशाएँ मिट गई हैं, जिसने अपने मन और इंद्रियों को वश में कर लिया है, और जिसने सब प्रकार के संग्रह का…
- 4.22 — जो बिना प्रयत्न के स्वतः प्राप्त वस्तु में सन्तुष्ट रहता है, जो सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों से ऊपर उठ चुका है,…
- 4.23 — जो पुरुष आसक्ति से रहित है, मुक्त है, जिसका मन ज्ञान में स्थित है और जो केवल यज्ञ के निमित्त ही कर्म करता…
- 4.24 — ब्रह्म ही अर्पण है, ब्रह्म ही हवि है, ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्म के द्वारा ही हवि की आहुति दी जाती है। जो…
- 4.25 — कुछ योगीजन देवताओं की उपासना रूपी यज्ञ करते हैं, जबकि अन्य ज्ञानीजन स्वयं को ही ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति के…
- 4.26 — अन्य योगी श्रोत्रादि इंद्रियों को संयम रूपी अग्नि में होम करते हैं, और अन्य लोग शब्दादि विषयों को इंद्रियों…
- 4.27 — अन्य योगीजन अपनी समस्त इन्द्रियों की क्रियाओं और प्राणों के व्यापारों को ज्ञान से प्रज्वलित आत्मसंयम रूपी…
- 4.28 — अन्य लोग द्रव्य-यज्ञ, तप-यज्ञ और योग-यज्ञ करने वाले होते हैं, और दूसरे कठिन व्रतों का पालन करने वाले संयमी…
- 4.29 — अन्य योगी अपान वायु में प्राण वायु को हवन करते हैं, और प्राण वायु में अपान की आहुति देते हैं; वे प्राण और…
- 4.30 — अन्य नियमित आहार करने वाले साधक अपने प्राणों को प्राणों में ही हवन करते हैं। ये सभी यज्ञ को जानने वाले हैं,…
- 4.31 — हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञ से बचे हुए अमृत रूपी अन्न को ग्रहण करने वाले योगी सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।…
- 4.32 — इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ वेदों में विस्तार से कहे गए हैं। उन सबको तुम कर्मजनित समझो; ऐसा जानकर तुम…
- 4.33 — हे परंतप! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यंत श्रेष्ठ है। हे अर्जुन! समस्त कर्म समग्र रूप से ज्ञान में…
- 4.34 — तत्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर उन्हें साष्टांग प्रणाम करो, उनसे जिज्ञासा करो और उनकी सेवा करो; वे ज्ञानी…
- 4.35 — जिस ज्ञान को जानकर तुम फिर कभी इस प्रकार मोहग्रस्त नहीं होगे, और हे अर्जुन! उस ज्ञान के द्वारा तुम संपूर्ण…
- 4.36 — यदि तुम सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो, तो भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा तुम निश्चय ही सम्पूर्ण पापों से…
- 4.37 — जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, वैसे ही हे अर्जुन, ज्ञानरूपी अग्नि समस्त कर्मों को भस्म कर…
- 4.38 — इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निस्संदेह कुछ भी नहीं है। जो मनुष्य योग में संसिद्ध (परिपूर्ण)…
- 4.39 — श्रद्धावान, तत्पर और जीतेन्द्रिय मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है; ज्ञान प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शान्ति को…
- 4.40 — किन्तु विवेकहीन, श्रद्धारहित और संशययुक्त मनुष्य का पतन हो जाता है; संशयी आत्मा के लिए न यह लोक है, न परलोक…
- 4.41 — जिसने योग द्वारा कर्मों का संन्यास कर दिया है, ज्ञान के द्वारा जिसके समस्त संशय नष्ट हो गए हैं और जो…
- 4.42 — इसलिए, अपने हृदय में स्थित अज्ञानजनित संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काटकर, हे भरतवंशी! योग में स्थित होकर उठ…