अध्याय 5: कर्मसंन्यासयोग

कर्मसंन्यासयोग (Karm Sanyās Yog) · 29 श्लोक

अध्याय सारांश

भगवद गीता का पांचवा अध्याय कर्मसन्यासयोग योग है। इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने कर्मयोग और कर्मसन्यासयोग कि तुलना करते हुआ यह बतलाया है कि यह दोनों मार्ग एक ही लक्ष्य तक पहुँचने के माध्यम हैं। इसलिए हम इनमें से किसी भी मार्ग का चुनाव कर सकते हैं। एक बुद्धिमान व्यक्ति को अपने कर्मों को भगवान को समर्पित करते हुए अथवा उनके फल कि चिंता करे बिना अपने सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए। इस तरह वे पाप से अप्रभावित रहते हैं और अंततः मुक्ति प्राप्त करते हैं।

श्लोक

  1. 5.1 — अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण! आप कभी कर्मों के त्याग (संन्यास) की प्रशंसा करते हैं और कभी निष्काम कर्मयोग की। इन…
  2. 5.2 — श्रीभगवान् बोले: कर्मसंन्यास और कर्मयोग—ये दोनों ही परम कल्याण करने वाले हैं, परन्तु इन दोनों में भी…
  3. 5.3 — जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी वस्तु की आकांक्षा करता है, उसे सदा संन्यासी ही समझना चाहिए। हे…
  4. 5.4 — केवल अज्ञानी ही सांख्य योग (ज्ञानयोग) और कर्मयोग को अलग-अलग मानते हैं, ज्ञानी पुरुष ऐसा नहीं मानते। जो…
  5. 5.5 — ज्ञानियों द्वारा जो स्थान प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों को भी वही प्राप्त होता है। जो पुरुष सांख्य…
  6. 5.6 — परंतु हे अर्जुन! कर्मयोग के बिना संन्यास प्राप्त करना कठिन है; योगयुक्त मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर…
  7. 5.7 — जो कर्मयोग में स्थित है, जिसका मन शुद्ध है, जिसने स्वयं को जीत लिया है, जिसने इन्द्रियों को वश में कर लिया…
  8. 5.8 — तत्त्वज्ञानी पुरुष देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूंघते, भोजन करते, चलते, सोते और श्वास लेते हुए भी यही मानता…
  9. 5.9 — बोलते हुए, त्यागते हुए, ग्रहण करते हुए, आँखें खोलते और बंद करते हुए भी, योगी यह समझता है कि केवल इन्द्रियाँ…
  10. 5.10 — जो मनुष्य समस्त कर्मों को ब्रह्म में समर्पित करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह पाप से वैसे ही लिप्त…
  11. 5.11 — योगीजन शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा आसक्ति को त्यागकर केवल आत्मशुद्धि के लिए कर्म करते हैं।
  12. 5.12 — युक्त पुरुष कर्मों के फल का त्याग करके नैष्ठिकी शान्ति को प्राप्त होता है, किन्तु जो अयुक्त पुरुष है, वह…
  13. 5.13 — सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्।।
  14. 5.14 — परमेश्वर न तो लोगों के लिए कर्तृत्व की रचना करते हैं, न कर्मों की, और न ही कर्मों के फल के संयोग की; यह सब…
  15. 5.15 — परमेश्वर न किसी के पाप को और न किसी के पुण्य को ही स्वीकार करते हैं; ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है, इसी कारण सब…
  16. 5.16 — परन्तु जिनका वह अज्ञान आत्मज्ञान के द्वारा नष्ट हो जाता है, उनके लिए वह ज्ञान सूर्य के समान उस परमात्मा को…
  17. 5.17 — जिनकी बुद्धि उस परमात्मा में लीन है, जिनका मन उसी तद्रूप हो गया है, जिनकी निष्ठा उसी में है और जो उसी को परम…
  18. 5.18 — ज्ञान और विनम्रता से युक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी पण्डितजन समभाव से देखते हैं।
  19. 5.19 — जिनका मन समत्व-भाव में स्थित है, उन्होंने जीवित रहते हुए ही संसार को जीत लिया है; क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और…
  20. 5.20 — जो स्थिर बुद्धि वाला, संशयरहित और ब्रह्मज्ञानी है, वह प्रिय वस्तु को पाकर न तो हर्षित होता है और न ही अप्रिय…
  21. 5.21 — बाह्य विषयों में आसक्तिरहित अन्तःकरण वाला पुरुष आत्मा में ही सुख का अनुभव करता है; ब्रह्म के ध्यान में लीन…
  22. 5.22 — हे कुन्तीपुत्र! इन्द्रियों और विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले जितने भी भोग हैं, वे सब दुखों के ही कारण…
  23. 5.23 — जो मनुष्य शरीर त्यागने से पूर्व इसी लोक में रहते हुए काम और क्रोध से उत्पन्न वेग को सहन करने में समर्थ है,…
  24. 5.24 — जो पुरुष अन्तरात्मा में ही सुख वाला है, जो आत्मा में ही रमण करने वाला है और जिसका ज्ञान भी आत्मा में ही…
  25. 5.25 — जिन ऋषियों के पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके समस्त द्वैत मिट गए हैं, जो संयमी हैं और जो संपूर्ण प्राणियों के हित…
  26. 5.26 — काम और क्रोध से मुक्त, संयत-चित्त और आत्मज्ञानी यतियों के लिए सब ओर ब्रह्म (मोक्ष) ही स्थित है।
  27. 5.27 — बाह्य विषयों को बाहर करके और दृष्टि को दोनों भौहों के बीच स्थित करके, नासिका में बहने वाली प्राण और अपान…
  28. 5.28 — जिसके इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि संयत हैं, ऐसा मोक्षपरायण मुनि सदा के लिए मुक्त ही है, क्योंकि वह इच्छा, भय और…
  29. 5.29 — जो मुझे समस्त यज्ञों और तपों का भोक्ता, समस्त लोकों का महान ईश्वर तथा सम्पूर्ण प्राणियों का परम मित्र जानकर…

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