अध्याय 5, श्लोक 25 (भगवद् गीता 5.25)

अध्याय 5: कर्मसंन्यासयोग

संस्कृत श्लोक

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः

लिप्यंतरण

labhante brahma-nirvāṇam ṛiṣhayaḥ kṣhīṇa-kalmaṣhāḥ chhinna-dvaidhā yatātmānaḥ sarva-bhūta-hite ratāḥ

शब्दार्थ

labhante—achieve; brahma-nirvāṇam—liberation from material existence; ṛiṣhayaḥ—holy persons; kṣhīṇa-kalmaṣhāḥ—whose sins have been purged; chhinna—annihilated; dvaidhāḥ—doubts; yata-ātmānaḥ—whose minds are disciplined; sarva-bhūta—for all living entities; hite—in welfare work; ratāḥ—rejoice

अनुवाद

जिन ऋषियों के पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके समस्त द्वैत मिट गए हैं, जो संयमी हैं और जो संपूर्ण प्राणियों के हित में तत्पर रहते हैं, वे मोक्ष को प्राप्त करते हैं।

अर्थ एवं व्याख्या

यह श्लोक आत्म-साक्षात्कार का एक ऐसा मार्ग प्रशस्त करता है जहाँ व्यक्तिगत मुक्ति और परोपकार एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। यहाँ 'द्वैत के मिटने' का अर्थ मन की उन उलझनों से ऊपर उठना है जो हमें सुख-दुःख और हानि-लाभ के चक्र में बांधे रखती हैं। जब साधक अपनी चेतना को संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठाकर समस्त प्राणियों के कल्याण में नियोजित करता है, तो उसके भीतर का अहंकार स्वतः ही नष्ट हो जाता है। यह शिक्षा हमें सिखाती है कि मोक्ष केवल हिमालय की गुफाओं में नहीं, बल्कि राग-द्वेष से मुक्त होकर जगत की सेवा करने में भी निहित है। एक सच्चा ज्ञानी वही है जो स्वयं को शांत रखकर दूसरों के दुखों को हरने का संकल्प लेता है।

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