अध्याय 4, श्लोक 30 (भगवद् गीता 4.30)
संस्कृत श्लोक
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति। सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः
लिप्यंतरण
apare niyatāhārāḥ prāṇān prāṇeṣu juhvati sarve py 'ete yajña-vido yajña-kṣapita-kalmaṣāḥ
शब्दार्थ
apare—others; niyata—controlled; āhārāḥ—eating; prāṇān—outgoing air; prāṇeṣu—in the outgoing air; sarve—all; api—although apparently different; ete—all these; yajñavidaḥ—conversant with the purpose of performing; yajña—sacrifices; kṣapita—being cleansed of the result of such performances; kalmaṣāḥ—sinful reactions; juhvati—sacrifices.
अनुवाद
अन्य नियमित आहार करने वाले साधक अपने प्राणों को प्राणों में ही हवन करते हैं। ये सभी यज्ञ को जानने वाले हैं, जिनके पाप यज्ञ के अनुष्ठान से नष्ट हो जाते हैं।
अर्थ एवं व्याख्या
यह श्लोक हमें सिखाता है कि यज्ञ केवल बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि आत्म-अनुशासन की एक गहन आंतरिक प्रक्रिया है। जब साधक अपने आहार और श्वास पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है, तो वह अपनी जीवन-शक्ति को व्यर्थ गँवाने के बजाय उसे आध्यात्मिक ऊर्जा में रूपांतरित कर देता है। यह साधना अज्ञानता और कुसंस्कारों रूपी पापों को दग्ध कर देती है, जिससे व्यक्ति का अंतःकरण शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार, दैनिक जीवन की हर क्रिया को सचेत होकर करना ही वास्तविक यज्ञ है, जो आत्मा को उसके शुद्ध स्वरूप से जोड़ता है। यह प्रक्रिया हमें सिखाती है कि स्वयं पर विजय प्राप्त करना ही परम तप और मुक्ति का मार्ग है।