अध्याय 4, श्लोक 2 (भगवद् गीता 4.2)

अध्याय 4: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

संस्कृत श्लोक

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप

लिप्यंतरण

evaṁ paramparā-prāptam imaṁ rājarṣhayo viduḥ sa kāleneha mahatā yogo naṣhṭaḥ parantapa

शब्दार्थ

evam—thus; paramparā—in a continuous tradition; prāptam—received; imam—this (science); rāja-ṛiṣhayaḥ—the saintly kings; viduḥ—understood; saḥ—that; kālena—with the long passage of time; iha—in this world; mahatā—great; yogaḥ—the science of Yog; naṣhṭaḥ—lost; parantapa—Arjun, the scorcher of foes

अनुवाद

इस प्रकार परम्परा से प्राप्त हुए इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु हे परन्तप! समय के अंतराल के कारण वह योग पृथ्वी पर नष्टप्राय हो गया।

अर्थ एवं व्याख्या

यह श्लोक हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक ज्ञान केवल पुस्तकों से नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा के जीवंत अनुभव से जीवित रहता है। जब सत्य का मार्ग समय की धूल में दब जाता है, तो मनुष्य अपनी मूल चेतना से विच्छेदित हो जाता है। यह शिक्षा देती है कि ज्ञान का संरक्षण और उसका सही उत्तराधिकार बहुत महत्वपूर्ण है, अन्यथा उच्च आदर्श केवल कोरी कल्पना बन जाते हैं। इसका मनोवैज्ञानिक निहितार्थ यह है कि हमें अपने भीतर दबी हुई उस प्राचीन विवेक-शक्ति को पुनः जागृत करना होगा जो कालान्तर में लुप्त हो गई है। यह श्लोक हमें परंपरा के प्रति सम्मान और अपनी साधना के प्रति सतर्क रहने की प्रेरणा देता है।

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