अध्याय 6, श्लोक 5 (भगवद् गीता 6.5)
संस्कृत श्लोक
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः
लिप्यंतरण
uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ
शब्दार्थ
uddharet—elevate; ātmanā—through the mind; ātmānam—the self; na—not; ātmānam—the self; avasādayet—degrade; ātmā—the mind; eva—certainly; hi—indeed; ātmanaḥ—of the self; bandhuḥ—friend; ātmā—the mind; eva—certainly; ripuḥ—enemy; ātmanaḥ—of the self
अनुवाद
मनुष्य को चाहिए कि वह अपने मन के द्वारा अपना उद्धार करे और अपना अध:पतन न होने दे, क्योंकि यह मन ही जीवात्मा का मित्र है और यह मन ही जीवात्मा का शत्रु भी है।
अर्थ एवं व्याख्या
यह श्लोक आत्म-विकास की सर्वोच्च जिम्मेदारी को रेखांकित करता है, जिसमें व्यक्ति स्वयं अपना उद्धारकर्ता है। जब मन अनुशासित और शुद्ध होता है, तो वह आत्मा के उत्थान में एक परम मित्र की भूमिका निभाता है, लेकिन असंयमित होने पर वही मन सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है। जीवन में कोई भी बाहरी शक्ति तब तक सहायक नहीं हो सकती जब तक कि हम स्वयं अपने भीतर के विकारों को दूर करने का संकल्प न लें। यह शिक्षा हमें सिखाती है कि हमारी मानसिक अवस्था ही हमारे भाग्य का निर्धारण करती है। अतः, अपनी चेतना को ऊँचा उठाना और स्वयं को पतन से बचाना ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।