अध्याय 7, श्लोक 23 (भगवद् गीता 7.23)
संस्कृत श्लोक
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि
लिप्यंतरण
antavat tu phalaṁ teṣhāṁ tad bhavatyalpa-medhasām devān deva-yajo yānti mad-bhaktā yānti mām api
शब्दार्थ
anta-vat—perishable; tu—but; phalam—fruit; teṣhām—by them; tat—that; bhavati—is; alpa-medhasām—people of small understanding; devān—to the celestial gods; deva-yajaḥ—the worshipers of the celestial gods; yānti—go; mat—my; bhaktāḥ—devotees; yānti—go; mām—to me; api—whereas
अनुवाद
परन्तु उन अल्प बुद्धि वाले मनुष्यों का वह फल नाशवान ही होता है। देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, परन्तु मेरे भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण समझाते हैं कि क्षणिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए की गई पूजा का परिणाम भी अस्थायी होता है। जो मनुष्य सांसारिक फल की कामना से देवताओं की शरण लेते हैं, वे केवल उस सीमित लोक तक ही पहुँच पाते हैं, जो समय के साथ समाप्त हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का तात्पर्य है कि वास्तविक शांति और अनंतता केवल उनकी शरण में ही निहित है। जो भक्त पूर्ण समर्पण के साथ श्रीकृष्ण को अपना एकमात्र लक्ष्य बनाते हैं, वे जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर उन्हें ही प्राप्त कर लेते हैं। यह शिक्षा मनुष्य को तुच्छ कामनाओं से ऊपर उठकर शाश्वत सत्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती है।