अध्याय 7, श्लोक 22 (भगवद् गीता 7.22)

अध्याय 7: ज्ञानविज्ञानयोग

संस्कृत श्लोक

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते। लभते च ततः कामान्मयैव विहितान् हि तान्

लिप्यंतरण

sa tayā śhraddhayā yuktas tasyārādhanam īhate labhate cha tataḥ kāmān mayaiva vihitān hi tān

शब्दार्थ

saḥ—he; tayā—with that; śhraddhayā—faith; yuktaḥ—endowed with; tasya—of that; ārādhanam—worship; īhate—tries to engange in; labhate—obtains; cha—and; tataḥ—from that; kāmān—desires; mayā—by me; eva—alone; vihitān—granted; hi—certainly; tān—those

अनुवाद

वह उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता की पूजा में संलग्न होता है और उससे अपने अभीष्ट भोगों को प्राप्त करता है, जो वास्तव में मेरे ही द्वारा प्रदान किए जाते हैं।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान कृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि वे ही समस्त ब्रह्मांड के मूल आधार हैं और सभी प्रार्थनाओं के फलदाता हैं। जब कोई भक्त श्रद्धापूर्वक किसी देवता की उपासना करता है, तो भगवान कृष्ण उस श्रद्धा को स्थिर रखते हुए उनकी कामनाओं की पूर्ति करते हैं। यह शिक्षा देती है कि मनुष्य जिसे भी पूजता है, अंततः वह शक्ति भगवान कृष्ण से ही प्रवाहित होती है। अपनी असीमित कृपा से भगवान कृष्ण अज्ञानतावश की गई पूजा को भी स्वीकार करते हैं ताकि भक्त धीरे-धीरे परिपक्व हो सके। अंततः यह ज्ञान भक्त को यह समझने में मदद करता है कि सब कुछ भगवान कृष्ण में ही निहित है।

Read this verse in English