अध्याय 7, श्लोक 29 (भगवद् गीता 7.29)
संस्कृत श्लोक
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्
लिप्यंतरण
jarā-maraṇa-mokṣhāya mām āśhritya yatanti ye te brahma tadviduḥ kṛitsnam adhyātmaṁ karma chākhilam
शब्दार्थ
jarā—from old age; maraṇa—and death; mokṣhāya—for liberation; mām—me; āśhritya—take shelter in; yatanti—strive; ye—who; te—they; brahma—Brahman; tat—that; viduḥ—know; kṛitsnam—everything; adhyātmam—the individual self; karma—karmic action; cha—and; akhilam—entire
अनुवाद
जो मेरे शरणागत होकर जरा और मरण से मुक्ति पाने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण समझाते हैं कि वास्तविक मुक्ति केवल प्रयास से नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण से प्राप्त होती है। जब साधक श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करता है, तो वह काल और मृत्यु के चक्र से ऊपर उठकर ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म के गूढ़ रहस्यों को समझ लेता है। यह ज्ञान मनुष्य के अहंकार को मिटाकर उसे यह अनुभव कराता है कि सब कुछ श्रीकृष्ण का ही विस्तार है। इस अवस्था में कर्म बंधन नहीं, बल्कि मुक्ति का मार्ग बन जाते हैं। श्रीकृष्ण की कृपा से साधक का दृष्टिकोण भौतिक सीमाओं से परे होकर शाश्वत सत्य में स्थिर हो जाता है।