अध्याय 8, श्लोक 13 (भगवद् गीता 8.13)
संस्कृत श्लोक
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्
लिप्यंतरण
oṁ ityekākṣharaṁ brahma vyāharan mām anusmaran yaḥ prayāti tyajan dehaṁ sa yāti paramāṁ gatim
शब्दार्थ
om—sacred syllable representing the formless aspect of God; iti—thus; eka-akṣharam—one syllabled; brahma—the Absolute Truth; vyāharan—chanting; mām—me (Shree Krishna); anusmaran—remembering; yaḥ—who; prayāti—departs; tyajan—quitting; deham—the body; saḥ—he; yāti—attains; paramām—the supreme; gatim—goal
अनुवाद
जो पुरुष ओऽम् इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण मृत्यु के अंतिम क्षण के लिए सर्वोच्च आध्यात्मिक मार्ग का रहस्योद्घाटन कर रहे हैं। ॐ का उच्चारण ब्रह्म की शक्ति का आवाहन है, जो आत्मा को भौतिक बंधनों से मुक्त करने की क्षमता रखता है। भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि मात्र अक्षर का जप पर्याप्त नहीं है, अपितु जप के साथ-साथ पूर्ण निष्ठा से उनका ही स्मरण अनिवार्य है। जब साधक का मन श्री कृष्ण के दिव्य स्वरूप में तल्लीन होकर देह का त्याग करता है, तब उसे आवागमन के चक्र से मुक्ति मिलती है। यह परम गति स्वयं श्री कृष्ण के चरणों में अनंत विश्राम और शाश्वत आनंद की प्राप्ति है।