अध्याय 8, श्लोक 12 (भगवद् गीता 8.12)
संस्कृत श्लोक
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्
लिप्यंतरण
sarva-dvārāṇi sanyamya mano hṛidi nirudhya cha mūrdhnyādhāyātmanaḥ prāṇam āsthito yoga-dhāraṇām
शब्दार्थ
sarva-dvārāṇi—all gates; sanyamya—restraining; manaḥ—the mind; hṛidi—in the heart region; nirudhya—confining; cha—and; mūrdhni—in the head; ādhāya—establish; ātmanaḥ—of the self; prāṇam—the life breath; āsthitaḥ—situated (in); yoga-dhāraṇām—the yogic concentration
अनुवाद
सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर, मन को हृदय में स्थिर करके और अपने प्राण को मस्तक में स्थापित करके, योग की धारणा में स्थित हो जाना चाहिए।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण हमें साधना की उस पराकाष्ठा का उपदेश दे रहे हैं, जहाँ साधक बाह्य जगत से नाता तोड़कर पूर्णतः प्रभु में लीन हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का यह निर्देश जीव को इन्द्रियों के कोलाहल से हटाकर हृदय रूपी मंदिर में स्वयं परमात्मा के दर्शन करने का मार्ग दिखाता है। जब साधक अपने प्राणों को ऊर्ध्वगामी बनाकर मस्तक में स्थित करता है, तब वह भौतिकता के बंधनों को त्यागकर मुक्ति की ओर अग्रसर होता है। यह प्रक्रिया केवल एक शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि स्वयं श्रीकृष्ण के चरणों में आत्मा को समर्पित करने की एक दिव्य पद्धति है। श्रीकृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण ही इस योगधारणा का एकमात्र और परम लक्ष्य है।