अध्याय 8, श्लोक 8 (भगवद् गीता 8.8)
संस्कृत श्लोक
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना। परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्
लिप्यंतरण
abhyāsa-yoga-yuktena chetasā nānya-gāminā paramaṁ puruṣhaṁ divyaṁ yāti pārthānuchintayan
शब्दार्थ
abhyāsa-yoga—by practice of yog; yuktena—being constantly engaged in remembrance; chetasā—by the mind; na anya-gāminā—without deviating; paramam puruṣham—the Supreme Divine Personality; divyam—divine; yāti—one attains; pārtha—Arjun, the son of Pritha; anuchintayan—constant remembrance
अनुवाद
हे अर्जुन! जो साधक अभ्यासयोग से युक्त होकर, अन्यत्र कहीं न जाने वाले चित्त से उस परम दिव्य पुरुष का निरंतर चिंतन करता है, वह उसको ही प्राप्त होता है।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण मनुष्य को उस सर्वोच्च लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग बता रहे हैं जो स्वयं वे हैं। श्री कृष्ण कहते हैं कि चित्त की चंचलता को निरंतर अभ्यास और वैराग्य के द्वारा नियंत्रित करके उसे केवल भगवान के दिव्य स्वरूप में स्थिर करना ही मुक्ति का उपाय है। जब भक्त का मन सांसारिक विषयों से हटकर पूर्णतः श्री कृष्ण में लीन हो जाता है, तब वह उनके परम धाम को प्राप्त करने का अधिकारी बन जाता है। यह योगेश्वर कृष्ण की कृपा है कि वे साधारण साधक को भी अपने दिव्य लोक की प्राप्ति का सुगम मार्ग दिखा रहे हैं। जो अनन्य भाव से निरंतर श्री कृष्ण का स्मरण करता है, उसके लिए संसार का बंधन स्वतः ही समाप्त हो जाता है।