अध्याय 9, श्लोक 30 (भगवद् गीता 9.30)
अध्याय 9: राजविद्याराजगुह्ययोग
संस्कृत श्लोक
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः
लिप्यंतरण
api chet su-durāchāro bhajate mām ananya-bhāk sādhur eva sa mantavyaḥ samyag vyavasito hi saḥ
शब्दार्थ
api—even; chet—if; su-durāchāraḥ—the vilest sinners; bhajate—worship; mām—me; ananya-bhāk—exclusive devotion; sādhuḥ—righteous; eva—certainly; saḥ—that person; mantavyaḥ—is to be considered; samyak—properly; vyavasitaḥ—resolve; hi—certainly; saḥ—that person
अनुवाद
यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझे भजता है, तो उसे साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि उसने यथार्थ निश्चय कर लिया है।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अपनी असीम कृपा का परिचय देते हुए बताते हैं कि उनके प्रति अनन्य भक्ति समस्त पापों को भस्म करने में समर्थ है। जब कोई जीवात्मा अपने समस्त दुराचरणों को त्याग कर पूर्ण शरणागति के साथ श्री कृष्ण का आश्रय लेती है, तो वह तत्काल धर्म के मार्ग पर प्रतिष्ठित हो जाती है। भगवान श्री कृष्ण का यह आश्वासन सिद्ध करता है कि परिवर्तन का सच्चा आधार बाहरी आचरण नहीं, अपितु अंतःकरण का दृढ़ संकल्प है। यह अनन्य निष्ठा ही साधक को मोक्ष के अधिकारी बनाती है और उसे भगवत्कृपा का पात्र बनाती है। श्री कृष्ण की यह घोषणा समस्त मानवता के लिए एक चिरंतन सत्य है कि भक्ति के पथ पर कोई भी व्यक्ति कभी अयोग्य नहीं है।