अध्याय 11, श्लोक 27 (भगवद् गीता 11.27)

अध्याय 11: विश्वरूपदर्शनयोग

संस्कृत श्लोक

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि। केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः

लिप्यंतरण

vaktrāṇi te tvaramāṇā viśanti daṁṣṭrā-karālāni bhayānakāni kecid vilagnā daśanāntareṣu sandṛśyante cūrṇitair uttamāṅgaiḥ

शब्दार्थ

vaktrāṇi—mouths; te—Your; tvaramāṇāḥ—fearful; viśanti—entering; daṁṣṭrā—teeth; karālāni—terrible; bhayānakāni—very fearful; kecit—some of them; vilagnāḥ—being attacked; daśanāntareṣu—between the teeth; sandṛśyante—being seen; cūrṇitaiḥ—smashed; uttama-aṅgaiḥ—by the head

अनुवाद

वे सब ही तीव्रता से आपके विकराल दाढ़ों वाले डरावने मुखों में प्रवेश कर रहे हैं और कई एक चूर्णित शिरों सहित आपके दांतों के बीच में फँसे हुए दिख रहे हैं।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को विराट रूप का वह भयानक सत्य दिखा रहे हैं, जो काल बनकर सम्पूर्ण जगत का संहार करता है। यह दृश्य स्पष्ट करता है कि समस्त जीव अपनी इच्छा के विरुद्ध भी श्री कृष्ण की काल-शक्ति के अधीन हैं, जो जन्म और मृत्यु का चक्र चलाती है। भगवन श्री कृष्ण यहाँ यह समझा रहे हैं कि भौतिक जगत में जिसका भी उदय हुआ है, उसका विनाश निश्चित है, अतः बुद्धिमान मनुष्य को नश्वर शरीर के मोह को त्यागकर श्री कृष्ण के चरणों में शरणागति लेनी चाहिए। यह दर्शन साधक को अहं के नाश की ओर ले जाता है और उसे यह बोध कराता है कि केवल श्री कृष्ण ही एकमात्र सत्य हैं। इस प्रकार, यह विराट दर्शन आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप से जोड़कर मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करता है।

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