अध्याय 13, श्लोक 11 (भगवद् गीता 13.11)
अध्याय 13: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
संस्कृत श्लोक
मयि चानन्ययोगेन भक्ितरव्यभिचारिणी।विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि
लिप्यंतरण
mayi chānanya-yogena bhaktir avyabhichāriṇī vivikta-deśha-sevitvam aratir jana-sansadi
शब्दार्थ
mayi—toward me; cha—also; ananya-yogena—exclusively united; bhaktiḥ—devotion; avyabhichāriṇī—constant; vivikta—solitary; deśha—places; sevitvam—inclination for; aratiḥ—aversion; jana-sansadi—for mundane society;
अनुवाद
अनन्ययोग के द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति, एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव और असंस्कृत जनों के समुदाय में अरुचि।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्रीकृष्ण ही परम सत्य और समस्त चराचर जगत के एकमात्र आधार हैं। जब भक्त अपने मन को संसार से हटाकर अनन्य भाव से उन परमात्मा में स्थिर करता है, तो उसे सर्वत्र उन्हीं की उपस्थिति का अनुभव होता है।