अध्याय 13, श्लोक 16 (भगवद् गीता 13.16)
अध्याय 13: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
संस्कृत श्लोक
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्
लिप्यंतरण
bahir antaśh cha bhūtānām acharaṁ charam eva cha sūkṣhmatvāt tad avijñeyaṁ dūra-sthaṁ chāntike cha tat
शब्दार्थ
bahiḥ—outside; antaḥ—inside; cha—and; bhūtānām—all living beings; acharam—not moving; charam—moving; eva—indeed; cha—and; sūkṣhmatvāt—due to subtlety; tat—he; avijñeyam—incomprehensible; dūra-stham—very far away; cha—and; antike—very near; cha—also; tat—he
अनुवाद
वह परमात्मा सब प्राणियों के भीतर और बाहर स्थित है, वही चर और अचर भी है। वह सूक्ष्म होने के कारण अविज्ञेय है; वही सुदूर और अत्यन्त समीप भी है।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण समस्त चराचर जगत के मूल आधार के रूप में अपनी सर्वव्यापकता का वर्णन कर रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण समझाते हैं कि वे ही वह परम सत्य हैं जो कण-कण में विद्यमान हैं, फिर भी माया के कारण सामान्य दृष्टि से परे हैं। जो अज्ञानी हैं उनके लिए वे अति दूर प्रतीत होते हैं, परन्तु जो भक्त अनन्य प्रेम से उन्हें भीतर खोजते हैं, उनके लिए वे स्वयं की आत्मा से भी अधिक निकट हैं। श्रीकृष्ण का यह ज्ञान जीव को यह बोध कराता है कि परमात्मा से भिन्न कुछ भी नहीं है। जब साधक इस दिव्य सत्य को स्वीकार कर लेता है, तब वह समस्त द्वैत और बंधनों से मुक्त होकर श्रीकृष्ण के शाश्वत स्वरूप में विलीन हो जाता है।