अध्याय 13, श्लोक 17 (भगवद् गीता 13.17)
अध्याय 13: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
संस्कृत श्लोक
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च
लिप्यंतरण
avibhaktaṁ cha bhūteṣhu vibhaktam iva cha sthitam bhūta-bhartṛi cha taj jñeyaṁ grasiṣhṇu prabhaviṣhṇu cha
शब्दार्थ
avibhaktam—indivisible; cha—although; bhūteṣhu—amongst living beings; vibhaktam—divided; iva—apparently; cha—yet; sthitam—situated; bhūta-bhartṛi—the sustainer of all beings; cha—also; tat—that; jñeyam—to be known; grasiṣhṇu—the annihilator; prabhaviṣhṇu—the creator; cha—and
अनुवाद
वह अविभक्त है, तथापि वह सब प्राणियों में विभक्त के समान स्थित है; वह परमात्मा ही प्राणियों को धारण करने वाला, संहार करने वाला और उत्पन्न करने वाला है।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ब्रह्मांड के उस परम सत्य को उजागर कर रहे हैं जो एक होने पर भी प्रत्येक जीव में व्याप्त है। यद्यपि परमात्मा अभिन्न हैं, फिर भी माया के कारण वे हमें भिन्न-भिन्न दिखाई देते हैं। योगेश्वर कृष्ण हमें सिखाते हैं कि वे ही संपूर्ण चराचर जगत के आधार हैं, जो सृष्टि की रचना और प्रलय दोनों के परम स्वामी हैं। इस दिव्य ज्ञान को आत्मसात करने से साधक के हृदय से पृथकता का भ्रम मिट जाता है और उसे सर्वत्र अपने प्रभु श्री कृष्ण के ही दर्शन होने लगते हैं। यह बोध ही जीव को मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करता है, जहाँ भक्त और भगवान का भेद समाप्त होकर केवल भगवत्प्रेम शेष रह जाता है।