अध्याय 13, श्लोक 20 (भगवद् गीता 13.20)
अध्याय 13: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
संस्कृत श्लोक
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान्
लिप्यंतरण
prakṛitiṁ puruṣhaṁ chaiva viddhy anādī ubhāv api vikārānśh cha guṇānśh chaiva viddhi prakṛiti-sambhavān
शब्दार्थ
prakṛitim—material nature; puruṣham—the individual souls; cha—and; eva—indeed; viddhi—know; anādī—beginningless; ubhau—both; api—and; vikārān—transformations (of the body); cha—also; guṇān—the three modes of nature; cha—and; eva—indeed; viddhi—know; prakṛiti—material energy; sambhavān—produced by
अनुवाद
प्रकृति और पुरुष को तुम अनादि जानो। और यह भी समझो कि सभी विकार और गुण प्रकृति से ही उत्पन्न हुए हैं।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यह दिव्य ज्ञान प्रदान कर रहे हैं कि यह संसार प्रकृति और पुरुष के संयोग से चल रहा है। भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि यद्यपि हम अनादि काल से इस माया में उलझे हैं, वास्तव में हमारे सभी विकार और गुण केवल भौतिक प्रकृति की ही देन हैं। जब साधक यह समझ लेता है कि वह इन गुणों से परे आत्मा है, तो वह माया के बंधनों से मुक्त होने लगता है। श्रीकृष्ण का यह उपदेश साधक को देह-अहंकार से ऊपर उठकर स्वयं को परमात्मा के चरणों में समर्पित करने का मार्ग दिखाता है। इस सत्य को जानकर ही जीवात्मा भवसागर से तरकर भगवान श्रीकृष्ण के नित्य धाम को प्राप्त कर सकती है।