अध्याय 13, श्लोक 19 (भगवद् गीता 13.19)
अध्याय 13: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
संस्कृत श्लोक
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः।मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते
लिप्यंतरण
iti kṣhetraṁ tathā jñānaṁ jñeyaṁ choktaṁ samāsataḥ mad-bhakta etad vijñāya mad-bhāvāyopapadyate
शब्दार्थ
iti—thus; kṣhetram—the nature of the field; tathā—and; jñānam—the meaning of knowledge; jñeyam—the object of knowledge; cha—and; uktam—revealed; samāsataḥ—in summary; mat-bhaktaḥ—my devotee; etat—this; vijñāya—having understood; mat-bhāvāya—my divine nature; upapadyate—attain
अनुवाद
इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय का संक्षेप में वर्णन किया गया। मेरा भक्त ही इसे तत्त्व से जानकर मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अपने भक्त को संसार के गूढ़ रहस्यों से अवगत कराते हैं। क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय का यह विभाजन स्पष्ट करता है कि संसार का आधार स्वयं योगेश्वर कृष्ण ही हैं। जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस सत्य को आत्मसात कर लेता है, वह माया के बंधनों से मुक्त होकर श्री कृष्ण के शाश्वत धाम का अधिकारी बन जाता है। यह ज्ञान केवल बुद्धि का विषय नहीं, बल्कि हृदय की भक्ति से प्राप्त होने वाला अनुभव है। श्री कृष्ण का आश्वासन है कि जो भी उनके प्रति समर्पित होकर इस दिव्य तत्व को जान लेता है, वह सीधे उनके दिव्य स्वरूप में विलीन हो जाता है।