अध्याय 13, श्लोक 29 (भगवद् गीता 13.29)
अध्याय 13: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
संस्कृत श्लोक
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्
लिप्यंतरण
samaṁ paśhyan hi sarvatra samavasthitam īśhvaram na hinasty ātmanātmānaṁ tato yāti parāṁ gatim
शब्दार्थ
samam—equally; paśhyan—see; hi—indeed; sarvatra—everywhere; samavasthitam—equally present; īśhvaram—God as the Supreme soul; na—do not; hinasti—degrade; ātmanā—by one’s mind; ātmānam—the self; tataḥ—thereby; yāti—reach; parām—the supreme; gatim—destination
अनुवाद
जो पुरुष सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित परमेश्वर को देखता है, वह अपने आप द्वारा अपनी आत्मा का अहित नहीं करता है; इस प्रकार वह परम गति को प्राप्त होता है।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से जीव को अज्ञान के अंधकार से बाहर निकलने का मार्ग दिखाते हैं। जब साधक यह अनुभव करता है कि वही परमात्मा हर कण में और हर जीव के हृदय में विराजमान है, तो उसका अहंकार गल जाता है और वह स्वयं का पतन करने वाले कर्मों से मुक्त हो जाता है। अज्ञानतावश स्वयं को देह मानकर जीव अपनी आत्मा का अनादर करता है, किंतु श्री कृष्ण के इस ज्ञान को आत्मसात करने पर वह परम सत्य को प्राप्त कर लेता है। यह समदृष्टि ही वह दिव्य नेत्र है जो मनुष्य को संसार के बंधनों से मुक्त कर सीधे भगवान श्री कृष्ण के धाम तक ले जाती है। यह बोध ही मनुष्य के जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य और परम कल्याण का आधार है।