अध्याय 13, श्लोक 6 (भगवद् गीता 13.6)
अध्याय 13: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
संस्कृत श्लोक
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः
लिप्यंतरण
mahā-bhūtāny ahankāro buddhir avyaktam eva cha indriyāṇi daśhaikaṁ cha pañcha chendriya-gocharāḥ
शब्दार्थ
mahā-bhūtāni—the (five) great elements; ahankāraḥ—the ego; buddhiḥ—the intellect; avyaktam—the unmanifested primordial matter; eva—indeed; cha—and; indriyāṇi—the senses; daśha-ekam—eleven; cha—and; pañcha—five; cha—and; indriya-go-charāḥ—the (five) objects of the senses;
अनुवाद
पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और अव्यक्त प्रकृति, तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और इन्द्रियों के पाँच विषय।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण 'क्षेत्र' यानी इस भौतिक जगत के चौबीस तत्वों का वर्णन कर रहे हैं। योगेश्वर कृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यह बोध करा रहे हैं कि जो कुछ भी हमें दिखाई देता है, वह केवल प्रकृति का एक अस्थायी विस्तार है। इन तत्वों के पृथक्करण के माध्यम से भगवान यह सिखाते हैं कि आत्मा इन जड़ पदार्थों से सर्वथा भिन्न और नित्य है। जब साधक यह समझ लेता है कि इंद्रियों का यह खेल नश्वर है, तो वह धीरे-धीरे अहंकार के बंधनों से मुक्त होने लगता है। श्री कृष्ण का यह दिव्य ज्ञान जीव को संसार के मोह से हटाकर परमात्मा की ओर ले जाने वाला एक मार्गदर्शक प्रकाश है।