अध्याय 13, श्लोक 8 (भगवद् गीता 13.8)

अध्याय 13: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग

संस्कृत श्लोक

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः

लिप्यंतरण

amānitvam adambhitvam ahinsā kṣhāntir ārjavam āchāryopāsanaṁ śhauchaṁ sthairyam ātma-vinigrahaḥ

शब्दार्थ

amānitvam—humbleness; adambhitvam—freedom from hypocrisy; ahinsā—non-violence; kṣhāntiḥ—forgiveness; ārjavam—simplicity; āchārya-upāsanam—service of the Guru; śhaucham—cleanliness of body and mind; sthairyam—steadfastness; ātma-vinigrahaḥ—self-control;

अनुवाद

अमानित्व, अदम्भित्व, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु की सेवा, शुद्धि, स्थिरता और आत्मसंयम।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने ज्ञान के उन साधनों का वर्णन किया है जो साधक को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाते हैं। ये गुण केवल बाहरी व्यवहार नहीं हैं, बल्कि ये साक्षात् परमात्मा श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त करने के मार्ग हैं। इन दिव्य गुणों को अपनाकर मनुष्य अपने अहंकार का नाश करता है और भगवद्भक्ति में लीन होता है। श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि इन गुणों का अभ्यास ही मोक्ष का द्वार है, जिससे आत्मा अपनी शुद्ध अवस्था को पुनः प्राप्त कर लेती है। जब साधक इन गुणों में स्थित हो जाता है, तो उसे सर्वत्र स्वयं योगेश्वर श्री कृष्ण का ही दर्शन होने लगता है।

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