अध्याय 13, श्लोक 9 (भगवद् गीता 13.9)

अध्याय 13: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग

संस्कृत श्लोक

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्

लिप्यंतरण

indriyārtheṣhu vairāgyam anahankāra eva cha janma-mṛityu-jarā-vyādhi-duḥkha-doṣhānudarśhanam

शब्दार्थ

indriya-artheṣhu—toward objects of the senses; vairāgyam—dispassion; anahankāraḥ—absence of egotism; eva cha—and also; janma—of birth; mṛityu—death; jarā—old age; vyādhi—disease; duḥkha—evils; doṣha—faults; anudarśhanam—perception;

अनुवाद

इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य और अहंकार का अभाव; जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और दुखों में दोषों का दर्शन करना।

अर्थ एवं व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को संसार की नश्वरता और वास्तविक ज्ञान का मार्ग दिखा रहे हैं। योगेश्वर कृष्ण यह समझाते हैं कि जब तक मनुष्य सांसारिक भोगों के प्रति आसक्त है, तब तक वह जन्म-मृत्यु के चक्र के कष्टों से मुक्त नहीं हो सकता। अहंकार का त्याग और जीवन की भौतिक चुनौतियों में दोष-दर्शन करना एक साधक के लिए वैराग्य की पहली सीढ़ी है। भगवन श्री कृष्ण की यह दिव्य वाणी हमें प्रेरित करती है कि हम अपनी चेतना को क्षणिक सुखों से हटाकर नित्य सत्य की ओर मोड़ें। जो भक्त कृष्ण की इस शिक्षा को हृदयंगम करता है, वही वास्तव में भवसागर से पार होकर मोक्ष का अधिकारी बनता है।

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