अध्याय 15, श्लोक 13 (भगवद् गीता 15.13)
संस्कृत श्लोक
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः
लिप्यंतरण
gām āviśhya cha bhūtāni dhārayāmy aham ojasā puṣhṇāmi chauṣhadhīḥ sarvāḥ somo bhūtvā rasātmakaḥ
शब्दार्थ
gām—earth; āviśhya—permeating; cha—and; bhūtāni—living beings; dhārayāmi—sustain; aham—I; ojasā—energy; puṣhṇāmi—nourish; cha—and; auṣhadhīḥ—plants; sarvāḥ—all; somaḥ—the moon; bhūtvā—becoming; rasa-ātmakaḥ—supplying the juice of life
अनुवाद
मैं पृथ्वी में प्रविष्ट होकर अपनी शक्ति से समस्त प्राणियों को धारण करता हूँ और रसस्वरूप चन्द्रमा होकर सब औषधियों अर्थात् वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण स्वयं को संपूर्ण सृष्टि का आधार और पोषक घोषित कर रहे हैं। वे अर्जुन को यह बोध करा रहे हैं कि यह प्रकृति स्वयं संचालित नहीं है, बल्कि उनके दिव्य ओज से ही स्थिर है। चंद्रमा के माध्यम से वनस्पतियों का पोषण करना यह दर्शाता है कि श्री कृष्ण का प्रेम और करुणा ही जीवन का मूल आधार है। एक भक्त के लिए यह सत्य अत्यंत महत्वपूर्ण है कि वह कण-कण में श्री कृष्ण के दर्शन करे। इस भाव को आत्मसात करने से साधक की दृष्टि बदल जाती है और वह समस्त जड़-चेतन में अपने आराध्य को देखकर मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है।