अध्याय 15: पुरुषोत्तमयोग

पुरुषोत्तमयोग (Puruṣhottam Yog) · 20 श्लोक

अध्याय सारांश

भगवद गीता का पंद्रहवा अध्याय पुरुषोत्तमयोग है। संस्कृत में, पुरूष का मतलब सर्वव्यापी भगवान है, और पुरुषोत्तम का मतलब है ईश्वर का कालातीत और पारस्परिक पहलू। कृष्णा बताते हैं कि ईश्वर के इस महान ज्ञान का उद्देश्य भौतिक संसार के बंधन से खुद को अलग करना है और कृष्ण को सर्वोच्च दिव्य व्यक्तित्व के रूप में समझना है, जो विश्व के शाश्वत नियंत्रक और निर्वाहक हैं। जो इस परम सत्य को समझता है वह प्रभु को समर्पण करता है और उनकी भक्ति सेवा में संलग्न हो जाता है।

श्लोक

  1. 15.1 — श्री भगवान् ने कहा: (ज्ञानी जन) ऊर्ध्वमूल और अधःशाखा वाले उस अविनाशी अश्वत्थ वृक्ष को संसार का स्वरूप बताते…
  2. 15.2 — उस संसार रूपी अश्वत्थ वृक्ष की शाखाएं तीनों गुणों द्वारा पोषित होकर ऊपर और नीचे फैली हुई हैं; विषयों के…
  3. 15.3 — इस संसार रूपी वृक्ष का स्वरूप जैसा कहा गया है, वैसा यहाँ (इस लोक में) नहीं देखा जाता, न तो इसका आदि है, न…
  4. 15.4 — तत्पश्चात उस परम पद को खोजना चाहिए जहाँ पहुँचकर जीव पुनः संसार में नहीं लौटते। मैं उस आदि पुरुष की शरण में…
  5. 15.5 — जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने संगदोष को जीत लिया है, जो नित्य परमात्मा के स्वरूप में स्थित हैं,…
  6. 15.6 — न वहाँ सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चंद्रमा और न ही अग्नि। उस परम धाम को प्राप्त करके जीव पुन: संसार में…
  7. 15.7 — इस जीव-लोक में मेरा ही एक सनातन अंश जीव-रूप धारण करता है और प्रकृति में स्थित छह इन्द्रियों (पाँच…
  8. 15.8 — जब जीव रूपी ईश्वर शरीर को धारण करता है और जब वह इसे छोड़ता है, तब वह इन इन्द्रियों और मन को वैसे ही साथ ले…
  9. 15.9 — यह जीव श्रोत्र, चक्षु, त्वचा, रसना, घ्राण और मन को आश्रय देकर विषयों का सेवन करता है।
  10. 15.10 — शरीर से निकलते हुए, शरीर में स्थित रहते हुए या गुणों के अधीन होकर विषयों को भोगते हुए भी, मूढ़ लोग इस आत्मा…
  11. 15.11 — प्रयत्नशील योगी जन अपने हृदय में स्थित आत्मा को साक्षात देखते हैं, परन्तु जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है और जो…
  12. 15.12 — जो तेज सूर्य में स्थित होकर सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है, तथा जो चन्द्रमा में है और जो अग्नि में है, उस…
  13. 15.13 — मैं पृथ्वी में प्रविष्ट होकर अपनी शक्ति से समस्त प्राणियों को धारण करता हूँ और रसस्वरूप चन्द्रमा होकर सब…
  14. 15.14 — मैं ही समस्त प्राणियों के देह में स्थित वैश्वानर अग्निरूप होकर प्राण और अपान से युक्त चार प्रकार के अन्न को…
  15. 15.15 — मैं सभी प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ, और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान तथा उनका अभाव होता है। मैं ही समस्त वेदों…
  16. 15.16 — इस संसार में दो प्रकार के पुरुष हैं: एक 'क्षर' यानी नश्वर और दूसरा 'अक्षर' यानी अनश्वर। समस्त प्राणियों के…
  17. 15.17 — परन्तु उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा कहलाता है और जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण करने…
  18. 15.18 — क्योंकि मैं नश्वर से परे हूँ और अविनाशी से भी उत्तम हूँ, इसीलिए संसार और वेद में मुझे पुरुषोत्तम के नाम से…
  19. 15.19 — हे भारत! जो संशयरहित होकर मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सम्पूर्ण भाव से मेरी भक्ति…
  20. 15.20 — हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार मेरे द्वारा यह अत्यंत गोपनीय शास्त्र कहा गया है; इसे जानकर मनुष्य बुद्धिमान हो…

Read this verse in English