अध्याय 15, श्लोक 20 (भगवद् गीता 15.20)

अध्याय 15: पुरुषोत्तमयोग

संस्कृत श्लोक

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ।एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत

लिप्यंतरण

iti guhyatamaṁ śhāstram idam uktaṁ mayānagha etad buddhvā buddhimān syāt kṛita-kṛityaśh cha bhārata

शब्दार्थ

iti—these; guhya-tamam—most secret; śhāstram—Vedic scriptures; idam—this; uktam—spoken; mayā—by me; anagha—Arjun, the sinless one; etat—this; buddhvā—understanding; buddhi-mān—enlightened; syāt—one becomes; kṛita-kṛityaḥ—who fulfills all that is to be accomplished; cha—and; bhārata—Arjun, the son of Bharat

अनुवाद

हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार मेरे द्वारा यह अत्यंत गोपनीय शास्त्र कहा गया है; इसे जानकर मनुष्य बुद्धिमान हो जाता है और उसके समस्त कर्तव्य पूर्ण हो जाते हैं।

अर्थ एवं व्याख्या

भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अपने भक्तों को उस परम सत्य का बोध कराते हैं जो समस्त वेदों का सार है। जब साधक यह समझ लेता है कि श्री कृष्ण ही पुरुषोत्तम हैं, तब उसके हृदय से अज्ञान का अंधकार सदा के लिए मिट जाता है। यह ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि हृदय का रूपांतरण है, जहाँ भक्त समस्त कर्मों को भगवद् अर्पण कर देता है। इस स्थिति में पहुँचकर, जीव को पुनः कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहता क्योंकि वह स्वयं को भगवान की सेवा में पूर्णतः समर्पित कर देता है। यही कृतकृत्य होने की पराकाष्ठा है, जहाँ आत्मा को मोक्ष का आनंद प्राप्त होता है।

Read this verse in English