अध्याय 15, श्लोक 19 (भगवद् गीता 15.19)
संस्कृत श्लोक
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत
लिप्यंतरण
yo mām evam asammūḍho jānāti puruṣhottamam sa sarva-vid bhajati māṁ sarva-bhāvena bhārata
शब्दार्थ
yaḥ—who; mām—me; evam—thus; asammūḍhaḥ—without a doubt; jānāti—know; puruṣha-uttamam—the Supreme Divine Personality; saḥ—they; sarva-vit—those with complete knowledge; bhajati—worship; mām—me; sarva-bhāvena—with one’s whole being; bhārata—Arjun, the son of Bharat
अनुवाद
हे भारत! जो संशयरहित होकर मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सम्पूर्ण भाव से मेरी भक्ति करता है।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण स्वयं के सर्वोच्च स्वरूप का अनावरण कर रहे हैं। जब साधक माया के भ्रम से मुक्त होकर श्री कृष्ण को ही समस्त चराचर जगत का परम आधार 'पुरुषोत्तम' मान लेता है, तब वह स्वतः ही सर्वज्ञ हो जाता है, क्योंकि उसने सत्य के मूल स्रोत को जान लिया है। ऐसी अवस्था में भक्ति केवल एक कर्मकांड नहीं रह जाती, बल्कि भक्त का पूरा अस्तित्व ही श्री कृष्ण की सेवा में समर्पित हो जाता है। हृदय की पूर्ण एकाग्रता और अनन्य भाव से की गई यह उपासना ही जीव को आवागमन के चक्र से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करती है। श्री कृष्ण का यह रहस्योद्घाटन मनुष्य को संकीर्णता से उठाकर परम पद की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।