अध्याय 17, श्लोक 26 (भगवद् गीता 17.26)
अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग
संस्कृत श्लोक
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते
लिप्यंतरण
sad-bhāve sādhu-bhāve cha sad ity etat prayujyate praśhaste karmaṇi tathā sach-chhabdaḥ pārtha yujyate
शब्दार्थ
sat-bhāve—with the intention of eternal existence and goodness; sādhu-bhāve—with auspicious intention; cha—also; sat—the syllable Sat; iti—thus; etat—this; prayujyate—is used; praśhaste—auspicious; karmaṇi—action; tathā—also; sat-śhabdaḥ—the word “Sat”; pārtha—Arjun, the son of Pritha; yujyate—is used;
अनुवाद
सद्भाव में और साधुभाव में 'सत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है, तथा हे अर्जुन! प्रशस्त कर्म में भी 'सत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण 'सत्' शब्द की दिव्यता और उसके व्यापक प्रभाव को समझा रहे हैं। श्री कृष्ण हमें सिखाते हैं कि सत्य और सज्जनता ही वास्तविक स्वरूप हैं, और जब हम शुभ कर्म करते समय 'सत्' का स्मरण करते हैं, तो वे कर्म दिव्य बन जाते हैं। यह भगवद ज्ञान साधक को संसार की नश्वरता से हटाकर शाश्वत ब्रह्म की ओर ले जाता है। जब भक्त हर कार्य को भगवान श्री कृष्ण को समर्पित कर 'सत्' के भाव में करता है, तो वह बंधनमुक्त होकर मोक्ष का अधिकारी बनता है। यह शिक्षा हमें स्मरण दिलाती है कि हमारा हर कर्म शुद्ध और परोपकारी होना चाहिए, जो सीधे सर्वोच्च सत्ता से जुड़ा हो।