अध्याय 18, श्लोक 11 (भगवद् गीता 18.11)
संस्कृत श्लोक
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते
लिप्यंतरण
na hi deha-bhṛitā śhakyaṁ tyaktuṁ karmāṇy aśheṣhataḥ yas tu karma-phala-tyāgī sa tyāgīty abhidhīyate
शब्दार्थ
na—not; hi—indeed; deha-bhṛitā—for the embodied being; śhakyam—possible; tyaktum—to give up; karmāṇi—activities; aśheṣhataḥ—entirely; yaḥ—who; tu—but; karma-phala—fruits of actions; tyāgī—one who renounces all desires for enjoying the fruits of actions; saḥ—they; tyāgī—one who renounces all desires for enjoying the fruits of actions; iti—as; abhidhīyate—are said
अनुवाद
देहधारी जीव द्वारा समस्त कर्मों का पूर्णतः त्याग कर पाना संभव नहीं है; अतः जो कर्मफल का त्याग करता है, उसे ही वास्तव में त्यागी कहा जाता है।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जब तक जीव देह धारण किए हुए है, तब तक प्रकृति के वशीभूत होकर कुछ न कुछ कर्म करना उसकी अनिवार्यता है। योगेश्वर कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि सच्चा वैराग्य कर्मों को छोड़ने में नहीं, बल्कि कर्मों के फलों के प्रति आसक्ति को त्यागने में है। जब साधक अपने सभी कर्मों का फल भगवान श्री कृष्ण को समर्पित कर देता है, तब वह कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है। यह दिव्य अंतर्दृष्टि साधक को संसार के कर्तव्यों का पालन करते हुए भी आध्यात्मिक मुक्ति की ओर ले जाती है। अतः श्री कृष्ण का यह उपदेश हमें सिखाता है कि निस्वार्थ भाव से किया गया प्रत्येक कर्म ही सच्ची उपासना है।