अध्याय 18, श्लोक 12 (भगवद् गीता 18.12)

अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग

संस्कृत श्लोक

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्

लिप्यंतरण

aniṣhṭam iṣhṭaṁ miśhraṁ cha tri-vidhaṁ karmaṇaḥ phalam bhavaty atyāgināṁ pretya na tu sannyāsināṁ kvachit

शब्दार्थ

aniṣhṭam—unpleasant; iṣhṭam—pleasant; miśhram—mixed; cha—and; tri-vidham—three-fold; karmaṇaḥ phalam—fruits of actions; bhavati—accrue; atyāginām—to those who are attached to persona reward; pretya—after death; na—not; tu—but; sanyāsinām—for the renouncers of actions; kvachit—ever

अनुवाद

कर्मों के शुभ, अशुभ और मिश्र—ये तीन प्रकार के फल उन लोगों को मरणोपरान्त प्राप्त होते हैं, जिन्होंने कर्मफल का त्याग नहीं किया है; परन्तु त्यागियों (संन्यासियों) को ये फल कभी प्राप्त नहीं होते।

अर्थ एवं व्याख्या

भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को कर्म के सूक्ष्म सिद्धांतों से अवगत करा रहे हैं। प्रभु का दिव्य संदेश है कि जब तक मनुष्य अपने कर्मों के फल की कामना से बंधा रहता है, तब तक वह जन्म-मरण के चक्र और उनके शुभ-अशुभ परिणामों से मुक्त नहीं हो सकता। योगीश्वर श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि सच्चा संन्यास कर्मों का त्याग नहीं, बल्कि कर्मों के प्रति आसक्ति का त्याग है। जब साधक अपने समस्त कर्मों को भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर देता है, तब वह इन त्रिविध फलों के बंधन से ऊपर उठ जाता है। इस प्रकार, भक्त को केवल प्रभु की शरण में जाने से उस शाश्वत शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है, जो समस्त कर्मबंधनों से परे है।

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