अध्याय 18, श्लोक 25 (भगवद् गीता 18.25)
संस्कृत श्लोक
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते
लिप्यंतरण
anubandhaṁ kṣhayaṁ hinsām anapekṣhya cha pauruṣham mohād ārabhyate karma yat tat tāmasam uchyate
शब्दार्थ
anubandham—consequences; kṣhayam—loss; hinsām—injury; anapekṣhya—by disregarding; cha—and; pauruṣham—one’s own ability; mohāt—out of delusion; ārabhyate—is begun; karma—action; yat—which; tat—that; tāmasam—in the mode of ignorance; uchyate—is declared to be
अनुवाद
जो कर्म मोहवश, परिणाम, हानि, हिंसा और अपने सामर्थ्य का विचार किए बिना किया जाता है, वह तामस कहलाता है।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण मोह के वशीभूत होकर किए जाने वाले कार्यों की अज्ञानता को उजागर कर रहे हैं। जब मनुष्य परिणाम, स्वयं की शक्ति या दूसरों को होने वाली क्षति का विचार किए बिना कर्म करता है, तो वह अंधकार में भटक जाता है। योगेश्वर कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि यह तामसिक वृत्ति साधक को आत्म-साक्षात्कार के मार्ग से दूर ले जाती है। भगवान श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण और उनकी दिव्य चेतना को धारण करके ही जीव इस मोह के जाल से बाहर निकल सकता है। जो भक्त अपने कर्मों को प्रभु की सेवा में समर्पित कर देता है, वही अंततः मोक्ष के अधिकारी के रूप में अपनी यात्रा पूर्ण करता है।