अध्याय 18, श्लोक 28 (भगवद् गीता 18.28)
संस्कृत श्लोक
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते
लिप्यंतरण
ayuktaḥ prākṛitaḥ stabdhaḥ śhaṭho naiṣhkṛitiko ‘lasaḥ viṣhādī dīrgha-sūtrī cha kartā tāmasa uchyate
शब्दार्थ
ayuktaḥ—undisciplined; prākṛitaḥ—vulgar; stabdhaḥ—obstinate; śhaṭhaḥ—cunning; naiṣhkṛitikaḥ—dishonest or vile; alasaḥ—slothful; viṣhādī—unhappy and morose; dīrgha-sūtrī—procrastinating; cha—and; kartā—performer; tāmasaḥ—in the mode of ignorance; uchyate—is said to be
अनुवाद
अयुक्त, प्राकृत, स्तब्ध, शठ, नैष्कृतिक, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री कर्ता तामस कहा जाता है।
अर्थ एवं व्याख्या
कुरुक्षेत्र के धर्मयुद्ध में भगवान श्री कृष्ण अज्ञानी कर्ता के स्वरूप को स्पष्ट कर रहे हैं, जिसका मन तमोगुण के अंधकार से आच्छादित रहता है। योगेश्वर कृष्ण हमें सिखाते हैं कि जो मनुष्य असंतुलित, जड़ और आलस्य में डूबा रहता है, वह अपनी आत्मा की उन्नति के मार्ग को स्वयं ही अवरुद्ध कर लेता है। भगवान श्री कृष्ण के अनुसार, ये दुर्गुण साधक को माया के पाश में बांधे रखते हैं और उसे भगवद्-प्राप्ति से दूर ले जाते हैं। साधक को इस तमोगुणी अवस्था का त्याग करके सात्विक प्रकाश की ओर अग्रसर होना चाहिए। श्री कृष्ण का यह संदेश समस्त मानवता के लिए एक चेतावनी है कि आलस्य और विषाद का त्याग करके ही आत्मा परम सत्य को प्राप्त कर सकती है।