अध्याय 18, श्लोक 29 (भगवद् गीता 18.29)
संस्कृत श्लोक
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय
लिप्यंतरण
buddher bhedaṁ dhṛiteśh chaiva guṇatas tri-vidhaṁ śhṛiṇu prochyamānam aśheṣheṇa pṛithaktvena dhanañjaya
शब्दार्थ
buddheḥ—of intellect; bhedam—the distinctions; dhṛiteḥ—of determination; cha—and; eva—certainly; guṇataḥ tri-vidham—according to the three modes of material nature; śhṛiṇu—hear; prochyamānam—described; aśheṣheṇa—in detail; pṛithaktvena—distinctly; dhanañjaya—conqueror of wealth, Arjun
अनुवाद
हे अर्जुन! अब मेरे द्वारा गुणों के अनुसार किए गए बुद्धि और धृति के त्रिविध भेदों को पूर्णतः और पृथक रूप से सुनो, जैसा कि मैं उनका वर्णन कर रहा हूँ।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्री कृष्ण, जो स्वयं परम सत्य और समस्त विद्याओं के स्रोत हैं, इस श्लोक में अर्जुन को यह बोध करा रहे हैं कि भौतिक जगत के बंधन से मुक्त होने के लिए बुद्धि और संकल्प का शुद्ध होना अनिवार्य है। योगेश्वर कृष्ण गुणों के प्रभाव का विस्तार से वर्णन कर रहे हैं ताकि साधक माया के सूक्ष्म आवरणों को पहचान सके। यह ज्ञान केवल एक सैद्धांतिक व्याख्या नहीं है, बल्कि मुक्ति का मार्ग है जिसे स्वयं पुरुषोत्तम ने प्रकट किया है। जब एक भक्त अपनी बुद्धि को सात्विक बनाता है और भगवद-आश्रय में रहकर दृढ़ संकल्प करता है, तभी वह भवसागर पार कर सकता है। श्री कृष्ण का यह उपदेश समस्त मानवता के लिए एक प्रकाश स्तंभ है, जो आत्मा को अज्ञान से हटाकर दिव्य चेतना की ओर ले जाता है।