अध्याय 18, श्लोक 30 (भगवद् गीता 18.30)
संस्कृत श्लोक
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी
लिप्यंतरण
pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha kāryākārye bhayābhaye bandhaṁ mokṣhaṁ cha yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī
शब्दार्थ
pravṛittim—activities; cha—and; nivṛittim—renuncation from action; cha—and; kārya—proper action; akārye—improper action; bhaya—fear; abhaye—without fear; bandham—what is binding; mokṣham—what is liberating; cha—and; yā—which; vetti—understands; buddhiḥ—intellect; sā—that; pārtha—son of Pritha; sāttvikī—in the nature of goodness
अनुवाद
हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्ति, कार्य और अकार्य, भय और अभय तथा बन्ध और मोक्ष को यथार्थ रूप से जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है।
अर्थ एवं व्याख्या
इस श्लोक के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को सात्त्विक बुद्धि का स्वरूप समझा रहे हैं, जो साधक को भ्रम के अंधकार से निकालकर सत्य के प्रकाश की ओर ले जाती है। प्रभु श्रीकृष्ण बताते हैं कि जब बुद्धि भगवद्भक्ति और विवेक से शुद्ध हो जाती है, तब वह सही और गलत के अंतर को स्पष्ट रूप से समझने में समर्थ होती है। यह बुद्धि का वह दिव्य स्तर है जहाँ जीव बंधन और मोक्ष के रहस्यों को जानकर स्वयं को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देता है। भगवान् श्रीकृष्ण का यह उपदेश समस्त मानवता के लिए है कि वे सांसारिक भय से मुक्त होकर नित्य-अनित्य का विवेक जगाएं। अंततः, श्रीकृष्ण की शरण में ही वह सात्त्विक बुद्धि प्राप्त होती है जो जीवात्मा को भवसागर से पार कर मोक्ष प्रदान करती है।