अध्याय 18, श्लोक 51 (भगवद् गीता 18.51)
संस्कृत श्लोक
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च।शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च
लिप्यंतरण
buddhyā viśhuddhayā yukto dhṛityātmānaṁ niyamya cha śhabdādīn viṣhayāns tyaktvā rāga-dveṣhau vyudasya cha
शब्दार्थ
buddhyā—intellect; viśhuddhayā—purified; yuktaḥ—endowed with; dhṛityā—by determination; ātmānam—the intellect; niyamya—restraining; cha—and; śhabda-ādīn viṣhayān—sound and other objects of the senses; tyaktvā—abandoning; rāga-dveṣhau—attachment and aversion; vyudasya—casting aside; cha—and;
अनुवाद
विशुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धैर्यपूर्वक अन्तःकरण को वश में करके, शब्दादि विषयों को त्यागकर तथा राग-द्वेष का परित्याग करके (साधक स्थितप्रज्ञ होता है)।
अर्थ एवं व्याख्या
भगवान श्री कृष्ण इस श्लोक में अर्जुन के माध्यम से सम्पूर्ण मानवता को आत्मा के शुद्धिकरण का मार्ग बता रहे हैं। जब साधक अपनी बुद्धि को सांसारिक मलिनता से मुक्त कर लेता है, तब वह योगेश्वर कृष्ण की भक्ति में स्थिर होने के योग्य बनता है। भगवान का निर्देश है कि इन्द्रिय-विषयों और द्वैत की भावनाओं—राग और द्वेष—को पूरी तरह त्यागकर ही जीवात्मा परमपद को प्राप्त कर सकती है। यह केवल एक अभ्यास नहीं, बल्कि एक दिव्य रूपांतरण है जो स्वयं भगवान श्रीकृष्ण की शरण में आने से ही पूर्ण होता है। यह अनुशासित अवस्था ही मोक्ष और शाश्वत आनंद का द्वार खोलती है।