अध्याय 2, श्लोक 17 (भगवद् गीता 2.17)

अध्याय 2: सांख्ययोग

संस्कृत श्लोक

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्। विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति

लिप्यंतरण

avināśhi tu tadviddhi yena sarvam idaṁ tatam vināśham avyayasyāsya na kaśhchit kartum arhati

शब्दार्थ

avināśhi—indestructible; tu—indeed; tat—that; viddhi—know; yena—by whom; sarvam—entire; idam—this; tatam—pervaded; vināśham—destruction; avyayasya—of the imperishable; asya—of it; na kaśhchit—no one; kartum—to cause; arhati—is able

अनुवाद

विनाशरहित तुम उसको जानो जिससे यह सारा जगत व्याप्त है। इस अविनाशी तत्त्व का नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है।

अर्थ एवं व्याख्या

यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमारी असली पहचान उस शाश्वत चेतना में है जो कण-कण में बसी है। जब हम अपने भीतर के इस अविनाशी स्वरूप को पहचान लेते हैं, तो मृत्यु और विनाश का भय स्वतः ही समाप्त हो जाता है। यह बोध हमें बाहरी परिवर्तनों के बीच भी मानसिक स्थिरता और शांति प्रदान करता है। इसका व्यावहारिक अर्थ है कि हम संसार के उतार-चढ़ाव में उलझने के बजाय उस आंतरिक सत्य से जुड़ें जो कभी नष्ट नहीं होता। यह आत्म-ज्ञान ही जीवन को निर्भीकता और परम आनंद की ओर ले जाता है।

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