अध्याय 2, श्लोक 16 (भगवद् गीता 2.16)

अध्याय 2: सांख्ययोग

संस्कृत श्लोक

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः

लिप्यंतरण

nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ ubhayorapi dṛiṣhṭo ’nta stvanayos tattva-darśhibhiḥ

शब्दार्थ

na—no; asataḥ—of the temporary; vidyate—there is; bhāvaḥ—is; na—no; abhāvaḥ—cessation; vidyate—is; sataḥ—of the eternal; ubhayoḥ—of the two; api—also; dṛiṣhṭaḥ—observed; antaḥ—conclusion; tu—verily; anayoḥ—of these; tattva—of the truth; darśhibhiḥ—by the seers

अनुवाद

असत् वस्तु का तो अस्तित्व नहीं है और सत् का कभी अभाव नहीं है। इन दोनों का ही तत्त्व, तत्त्वदर्शी ज्ञानियों द्वारा देखा गया है।

अर्थ एवं व्याख्या

यह श्लोक हमें जीवन की क्षणभंगुरता और शाश्वत सत्य के बीच का अंतर समझाता है। जब हम यह समझ लेते हैं कि शरीर और संसार परिवर्तनशील हैं और आत्मा ही एकमात्र सत्य है, तो हमारे भीतर से मृत्यु और हानि का भय समाप्त हो जाता है। यह ज्ञान हमें द्वंद्वों से ऊपर उठकर एक स्थिर और शांत चित्त बनाने में मदद करता है। दैनिक जीवन में इसका अर्थ यह है कि हम सुख-दुख की परिस्थितियों में विचलित हुए बिना अपने कर्तव्य का पालन करें। इस बोध से व्यक्ति स्वयं के वास्तविक स्वरूप को जानकर जीवन के हर उतार-चढ़ाव में मानसिक संतुलन बनाए रखने में समर्थ होता है।

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