अध्याय 2, श्लोक 23 (भगवद् गीता 2.23)
संस्कृत श्लोक
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः
लिप्यंतरण
nainaṁ chhindanti śhastrāṇi nainaṁ dahati pāvakaḥ na chainaṁ kledayantyāpo na śhoṣhayati mārutaḥ
शब्दार्थ
na—not; enam—this soul; chhindanti—shred; śhastrāṇi—weapons; na—nor; enam—this soul; dahati—burns; pāvakaḥ—fire; na—not; cha—and; enam—this soul; kledayanti—moisten; āpaḥ—water; na—nor; śhoṣhayati—dry; mārutaḥ—wind
अनुवाद
इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि इसे जला नहीं सकती, जल इसे भिगो नहीं सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती।
अर्थ एवं व्याख्या
यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमारी आत्मा भौतिक सीमाओं और विनाश से सर्वथा परे है। जब हम यह समझ लेते हैं कि हमारा वास्तविक स्वरूप अमर और शाश्वत है, तो मृत्यु और हानि का भय स्वतः समाप्त हो जाता है। यह ज्ञान हमें जीवन के उतार-चढ़ाव में मानसिक स्थिरता बनाए रखने की शक्ति देता है। इस सत्य को आत्मसात करके, हम बाहरी परिस्थितियों के प्रभाव से मुक्त होकर अपनी आंतरिक शांति और निडरता को पुनः प्राप्त कर सकते हैं।