अध्याय 6, श्लोक 22 (भगवद् गीता 6.22)
संस्कृत श्लोक
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते
लिप्यंतरण
yaṁ labdhvā chāparaṁ lābhaṁ manyate nādhikaṁ tataḥ yasmin sthito na duḥkhena guruṇāpi vichālyate
शब्दार्थ
yam—which; labdhvā—having gained; cha—and; aparam—any other; lābham—gain; manyate—considers; na—not; adhikam—greater; tataḥ—than that; yasmin—in which; sthitaḥ—being situated; na—never; duḥkhena—by sorrow; guruṇā—(by) the greatest; api—even; vichālyate—is shaken
अनुवाद
जिस लाभ को प्राप्त कर लेने के बाद वह उससे बढ़कर किसी अन्य लाभ को नहीं मानता, और जिसमें स्थित होकर वह बड़े-से-बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता।
अर्थ एवं व्याख्या
यह श्लोक उस परम संतोष की अवस्था का वर्णन करता है, जहाँ भक्त को यह बोध हो जाता है कि आत्म-साक्षात्कार से बड़ा इस संसार में कुछ भी नहीं है। जब मनुष्य अपनी चेतना को परमात्मा में स्थिर कर लेता है, तब बाहरी दुनिया के उतार-चढ़ाव उसका मन विचलित नहीं कर पाते। यह शिक्षा हमें सिखाती है कि हमारे दुखों का मुख्य कारण हमारी अपूर्ण इच्छाएं हैं, जो हमें क्षणिक सुखों की ओर भागने पर मजबूर करती हैं। जब हम भीतर से पूर्ण हो जाते हैं, तो बाहरी अभाव हमें प्रभावित करना बंद कर देते हैं। यह एक ऐसी मनोवैज्ञानिक दृढ़ता है, जो जीवन की सबसे कठिन चुनौतियों में भी हमें शांत और स्थिर बनाए रखती है।